(1) मरीचि के पुत्र कश्यप प्रजापति थे। ब्रह्मदेव की दाहिनी हाथ की बोटे की नली से दक्ष नाम का पुरुष और बाएँ हाथ की बोटे की नली से धरनी नाम की स्त्री जन्मीं। उन दोनों से एक हज़ार-हज़ार महा ऋषि जन्मे। (2) ब्रह्मा के मानस पुत्रों में दूसरे स्थान पर रहने वाले अंगिरस्‍ु को उद्दध्य, बृहस्पति और संवर्त जैसे पुत्र हुए। बृहस्पति देवताओं के आचार्य बने। (3) मैत्रि (अत्रि) नामक मानस पुत्र से अनेक महा मुनि जन्मे। (4) पुलस्त्य नामक ब्रह्मा के मानस पुत्र से राक्षसों का जन्म हुआ। (5) पुलह नामक मानस पुत्र से किन्नर और किमपुरुष वर्ग उत्पन्न हुए। (6) क्रतू नामक मानस पुत्र से पक्षियों की जाति उत्पन्न हुई।

   
    

Aadiparv (Mahabharat) - आदिपर्व (महाभारत)


॥ श्रीः ॥
1.81. अध्यायः 081
Mahabharata - Adi Parva - Chapter Topics
इन्द्रययातिसंवादः॥ 1 ॥
Mahabharata - Adi Parva - Chapter Text

वैशम्पायन उवाच। 1-81-0x(486)(3660)
स्वर्गतः स तु राजेन्द्रो निवसन्देववेश्मनि।
पूजितस्त्रिदशैः साध्यैर्मरुद्भिर्वसुभिस्तथा॥ 1-81-1(3661)
देवलोकं ब्रह्मलोकं संचरन्पुण्यकृद्वशी।
अवसत्पृथिवीपालो दीर्घकालमिति श्रुतिः॥ 1-81-2(3662)
स कदाचिन्नृपश्रेष्ठो ययातिः शक्रमागमत्।
कथान्ते तत्र शक्रेण स पृष्टः पृथिवीपतिः॥ 1-81-3(3663)
शक्र उवाच। 1-81-4x(487)
यदा स पूरुस्तव रूपेण राज-
ञ्जरां गृहीत्वा प्रचचार भूमौ।
तदा च राज्यं संप्रदायैव तस्मै
त्वया किमुक्तः कथयेह सत्यम्॥ 1-81-4(3664)
ययातिरुवाच। 1-81-5x(488)
गङ्गायमुनयोर्मध्ये कृत्स्नोयं विषयस्तव।
मध्ये पृथिव्यास्त्वं राजा भ्रातरोऽन्त्याधिपास्तव॥ 1-81-5(3665)
`न च कुर्यान्नरो दैन्यं शाठ्यं क्रोधं तथैव च।
जैहयं च मत्सरं वैरं सर्वत्रेदं न कारयेत्॥ 1-81-6(3666)
मातरं पितरं ज्येष्ठं विद्वांसं च तपोधनम्।
क्षमावन्तं च राजेन्द्र नावमन्येत बुद्धिमान्॥ 1-81-7(3667)
ळशक्तस्तु क्षमते नित्यमशक्तः क्रुध्यते नरः।
दुर्जनः सुजनं द्वेष्टि दुर्बलो बलवत्तरम्॥ 1-81-8(3668)
रूपवन्तमरूपी च धनवन्तं च निर्धनः।
अकर्मी कर्मिणं द्वेष्टि धार्मिकं च नधार्मिकः॥ 1-81-9(3669)
निर्गुणो गुणवन्तं च पुत्रैतत्कलिलक्षणम्।
विपरीतं च राजेन्द्र एतेषु कृतलक्षणम्॥ 1-81-10(3670)
ब्राह्मणो वाथ वा राजा वैश्यो वा शूद्र एव वा।
प्रशस्तेषु प्रसक्ताश्चेत्प्रशस्यन्ते यशस्विनः॥ 1-81-11(3671)
तस्मात्प्रशस्ते राजेन्द्र नरः सक्तमना भवेत्।
अलोकज्ञा ह्यप्रशस्ता भ्रातरस्ते ह्यबुद्धयः॥ 1-81-12(3672)
अन्त्याधिपतयः सर्वे ह्यभवन्गुरुशासनात्। 1-81-13(3673)
इन्द्र उवाच।
त्वं हि धर्मविदो राजन्कत्थसे धर्मसुत्तमम्।
कथयस्व पुनर्मेऽद्य लोकवृत्तान्तमुत्तमम्॥ 1-81-13x(489)
ययातिरुवाच' 1-81-14x(490)
अक्रोधनः क्रोधनेभ्यो विशिष्ट-
स्तथा तितिक्षुरतितिक्षोर्विशिष्टः।
अमानुषेभ्यो मानुषाश्च प्रधाना
विद्वांस्तथैवाविदुषः प्रधानः॥ 1-81-14(3674)
आक्रुश्यमानो नाकोशेन्मन्युरेव तितिक्षतः।
आक्रोष्टारं निर्दहति सुकृतं चास्य विन्दति॥ 1-81-15(3675)
नारुन्तुदः स्यान्न नृशंसवादी
न हीनतः परमभ्याददीत।
ययाऽस्य वाचा पर उद्विजेत
न तां वदेद्रुशतीं पापलोक्याम्॥ 1-81-16(3676)
अरुन्तुदं पुरुषं तीक्ष्णवाचं
वाक्कण्टकैर्वितुदन्तं मनुष्यन्।
विद्यादलक्ष्मीकतमं जनानां
मुखे निबद्धां निर्ऋतिं वहन्तम्॥ 1-81-17(3677)
सद्भिः पुरस्तादभिपूजितः स्या-
त्सद्भिस्तथा पृष्ठतो रक्षितः स्यात्।
सदाऽसतामतिवादांस्तितिक्षे-
त्सतां वृत्तं चाददीतार्यवृत्तः॥ 1-81-18(3678)
वाक्सायका वदनान्निष्पतन्ति
यैराहतः शोचति रात्र्यहानि।
परस्य ये मर्मसु संपतन्ति
तान्पण्डितो नावसृजेत्परेषु॥ 1-81-19(3679)
नहीदृशं संवननं त्रिषु लोकेषु विद्यते।
दया मैत्री च भूतेषु दानं च मधुरा च वाक्॥ 1-81-20(3680)
तस्मात्सान्त्वं सदा वाच्यं न वाच्यं परुषं क्वचित्।
पूज्यान्संपूजयेद्दद्यान्न च याचेत्कदाचन॥ ॥ 1-81-21(3681)

इति श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि संभवपर्वणि एकाशीतितमोऽध्यायः॥ 81 ॥

Mahabharata - Adi Parva - Chapter Footnotes
1-81-16 अस्य आक्रोष्टुः सुकृतं तितिक्षुर्विन्दति। रुशतीं अकल्याणी॥ 1-81-17 निर्ऋति दुर्देवताम्॥ 1-81-20 संवननं वशीकरणम्॥ एकाशीतितमोऽध्यायः॥ 81 ॥


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